दुनियादारी औगणकारी
दुनियादारी औगणकारी
जाने भेद मत दईजे रे
हेली म्हारी निर्भय रहीजे रे …
दुनियादारी औगणकारी
जाने भेद मत दईजे रे
हेली म्हारी निर्भय रहीजे रे
इण काया में अष्ट कमल हैं …
इण काया में
हो ओ इण काया में
अष्ट कमल ज्योरी निंगे कराइजे रे …..
हेली म्हारी निर्भय रहीजे रे …
सत संगत में ए ए ए…
सत संगत
सत संगत में बैठ सुहागण …
साच कमाइजे ए ए ए
हेली म्हारी निर्भय रहीजे रे …
धन में गरीबी
मन में फकीरी ….
धन में गरीबी
हो ओ धन में गरीबी
मन में फकीरी
दया भावना राखिजे ए ए
हेली म्हारी निर्भय रहीजे रे …
ज्ञान झरोखे ए ए …
ज्ञान झरोखे…
ज्ञान झरोखे …
बैठ सुहागण …
झालो दईजे ए ए
हेली म्हारी निर्भय रहीजे रे …
त्रिवेणी घर,
तीन पदमणी …
त्रिवेणी घर
हो ओ त्रिवेणी घर,
तीन पदमणी
उण जाए बतलाईजे रे
हेली म्हारी निर्भय रहीजे रे …
सत बाण पर ……
सत बाण पर…..
सत बाण पर……
बैठ सुहागण …
सीधी आईजे ए ए
हेली म्हारी निर्भय रहीजे रे …
हरी चरणों में
शीश झुकाईजे…
हरी चरणों में
हो ओ हरी चरणों में
शीश झुकाईजे
गुरु वचनों में रहीजे ए
हेली म्हारी निर्भय रहीजे रे …
कहेत कबीर सुणों भाई साधू …
शीतल होइजे ए ए
हेली म्हारी निर्भय रहीजे रे …
भजन का भावार्थ – “हेली म्हारी निर्भय रहीजे रे”
“दुनियादारी औगणकारी…”
यह संसार मोह, छल और अवगुणों से भरा हुआ है।
संत कहते हैं कि दुनिया के भेदभाव, ईर्ष्या और छल-कपट में मत पड़ो।
हे आत्मा (हेली), तू निर्भय होकर प्रभु मार्ग पर चलती रह।
“इण काया में अष्ट कमल हैं…”
मानव शरीर कोई साधारण देह नहीं, इसमें आध्यात्मिक शक्ति के कमल (चक्र) छिपे हैं।
साधना और गुरु कृपा से इन चेतना केंद्रों को जागृत करो।
“सत संगत में बैठ सुहागण…”
सत्संग में बैठकर सच्चे ज्ञान और भक्ति की कमाई करो।
जो आत्मा प्रभु प्रेम में जुड़ जाती है वही सच्ची “सुहागन” कहलाती है।
“धन में गरीबी, मन में फकीरी…”
बाहरी धन-दौलत चाहे कम हो,
लेकिन मन में फकीरी, विनम्रता और दया का भाव होना चाहिए।
यही संतों का सच्चा वैभव है।
“ज्ञान झरोखे बैठ सुहागण…”
ज्ञान के झरोखे में बैठकर आत्मचिंतन करो।
अज्ञान का पर्दा हटाकर भीतर के प्रकाश को देखो।
“त्रिवेणी घर, तीन पदमणी…”
यहाँ त्रिवेणी का अर्थ शरीर के भीतर की तीन नाड़ियों (इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना) से माना गया है।
संत संकेत देते हैं कि साधक को उस दिव्य मार्ग का अनुभव गुरु से प्राप्त करना चाहिए।
“सत बाण पर बैठ सुहागण…”
सत्य के मार्ग पर स्थिर होकर सीधी राह चलो।
मन को भटकने न दो और ईश्वर की ओर बढ़ते रहो।
“हरी चरणों में शीश झुकाईजे…”
प्रभु के चरणों में समर्पण करो और गुरु के वचनों में स्थिर रहो।
अंत में संत कबीर कहते हैं — जो साधक गुरु मार्ग पर चलता है उसका मन शीतल और शांत हो जाता है।
इस भजन का मुख्य संदेश
• संसार के मोह से दूर रहो
• सत्संग और गुरु वाणी को अपनाओ
• मन में दया और फकीरी रखो
• आत्मज्ञान की ओर बढ़ो
• प्रभु चरणों में समर्पित रहो
यह भजन संत कबीर और निर्गुण भक्ति परंपरा की गहरी छाप लिए हुए है !
