अर्बुदा माताजी (अधरदेवी) मंदिर आबूराज : इतिहास, आस्था और दिव्यता की अनकही कथा
राजस्थान के सिरोही ज़िले में स्थित आबुराज माउंट आबू न सिर्फ अपने प्राकृतिक सौंदर्य व ठंडी वादियों के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यहाँ स्थित अर्बुदा माताजी का प्राचीन मंदिर भी भक्तों के लिए आस्था का केन्द्र है ! अरावली पर्वत श्रंखला की गोद में विराजमान अर्बुदा माता को आबू पर्वत की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है ! कहा जाता है कि माता अर्बुदा के वरदान के ही प्रभाव से यह पर्वत ‘आबु’ नाम से प्रसिद्ध हुआ !
सदियों से राजस्थान, गुजरात सहित देश के असंख्य भक्त यहाँ दर्शन के लिए आते हैं और माता के चरणों में अपनी मनोकामनाएँ अर्पित करते हैं ! आबुराज माउंट आबू की ऊँची चट्टानों, प्राकृतिक हरियाली और दिव्य वातावरण के बीच स्थित यह मंदिर आत्मा को एक अलौकिक शांति का अनुभव कराता है !

अर्बुदा माता को अधर देवी क्यों कहा जाता है ? (मौलिक वर्णन)
अर्बुदा माताजी को “अधर देवी” कहने के पीछे दो प्रमुख धार्मिक मान्यताएँ प्रचलित हैं, जो भक्तों के बीच अत्यंत पूज्य और आदरणीय हैं।
1) सती के अधर (होंठ) यहाँ गिरने की मान्यता
पुराणों के अनुसार, जब भगवान शिव माँ सती के शरीर को लेकर तांडव कर रहे थे, तब संसार और सृष्टि के संतुलन को बनाए रखने के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र चलाकर सती के शरीर के अंगों को अलग-अलग स्थानों पर गिरे ! जिस स्थान पर ये अंग गिरे, वहाँ शक्तिपीठों की स्थापना हुई !
कथाओं में बताया गया है कि माँ सती के अधर (होंठ) इस पर्वत स्थल पर गिरे थे, इसलिए यहाँ स्थित मंदिर को “अधर देवी का शक्तिपीठ” कहा जाता है ! इस प्रकार यह स्थान 51 शक्तिपीठों में से एक माना गया है !
2) मूर्ति का अधर (हवा में) स्थित होना
एक अन्य लोकप्रिय आस्था यह कहती है कि यहाँ माता की प्रतिमा चट्टान से बिल्कुल सटी हुई नहीं, बल्कि थोड़ी अधर (ऊपर / हवा में तैरती हुई) प्रतीत होती है ! ऐसा लगता है जैसे प्रतिमा बिना किसी भौतिक आधार के स्वयं खड़ी है, जिसे भक्त दिव्य चमत्कार मानते हैं ! इसी विशेषता के कारण माता को अधर देवी कहा जाने लगा !
कात्यायनी स्वरूप की मान्यता

अर्बुदा देवी को माता दुर्गा के छठे स्वरूप ‘कात्यायनी’ का अवतार माना जाता है ! नवरात्रि के छठे दिन इनकी पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है !
कात्यायनी स्वरूप में माता बल, साहस, बुद्धि और रक्षा का वरदान देने वाली मानी गई हैं ! इसलिए श्रद्धालु यहाँ आकर अपने घर-परिवार, व्यापार, संतान तथा जीवन में सुख-शांति की कामना करते हैं !
अर्बुदा माता को अधर देवी कहने के दो पवित्र कारण हैं:
• सती के होंठ यहाँ गिरने से यह स्थान शक्तिपीठ बना !
• माता की प्रतिमा अधर (हवा में) स्थित प्रतीत होती है !
साथ ही, यहाँ माता को कात्यायनी स्वरूप में पूजा जाता है, जो भक्ति, शक्ति और रक्षण का प्रतीक है।
अर्बुदा माता कौन हैं ?
पौराणिक मान्यताओं में अर्बुदा माता को भगवान शिव की शक्ति स्वरूपा माना जाता है ! कुछ मान्यताओं में इन्हें नागों की रक्षक देवी कहा गया है, जबकि स्थानीय लोक कथाओं में देवी को आबुराज आबू पर्वत की संरक्षिका माना गया है ! ऐसा विश्वास है कि प्राचीन समय में जब धरती पर संकट आया, तब अर्बुदा माता ने साधू संतो और प्राणियों की रक्षा की !
माता का नाम ‘अर्बुदा’ संस्कृत के शब्द ‘अर्बुद’ से उत्पन्न माना जाता है, जिसका अर्थ है ‘एक विशाल पर्वत’ ! यह पर्वत ही आज का आबुराज माउंट आबू है !

मंदिर का इतिहास और पुरातात्विक महत्व
अर्बुदा माता मंदिर को हजारों वर्ष पुराना माना जाता है ! यहाँ शिलालेखों और स्थानीय कथाओं से प्रमाण मिलता है कि मंदिर महाभारत काल से पूर्व का है ! यह मंदिर एक ऊँची और विशाल चट्टान पर बना हुआ है जहाँ तक पहुँचने के लिए भक्तों को सैकड़ों सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं ! इस कठिन चढ़ाई को ‘भक्ति की परीक्षा’ भी कहा जाता है ! माना जाता है कि जो व्यक्ति पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ यहाँ माता के दर्शन करता है, उसकी हर मनोकामना पूर्ण होती है !

मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा
स्थानीय किंवदंती के अनुसार, प्राचीन काल में नंदी (भगवान शिव के वाहन) का एक पैर इस पर्वत में फँस गया था और उसे निकालने में अत्यंत कठिनाई हुई। तब अर्बुदा माता प्रकट हुईं और नंदी को मुक्त कराया। इस घटना के बाद भगवान शिव ने माता से वर मांगा कि वे इस पर्वत की रक्षक बनकर सदैव प्रतिष्ठित रहें। तब से माता का निवास यहाँ माना जाता है !
एक दूसरी कथा के अनुसार, यह स्थान नाग वंश का प्राचीन तपोस्थल रहा है ! यहाँ नाग पूजन आज भी विशेष रूप से किया जाता है !
मंदिर की वास्तुकला और प्राकृतिक सौंदर्य
अर्बुदा माता मंदिर का प्रांगण चट्टानों से घिरा हुआ है। एक ओर विशाल पर्वत की गहराई और दूसरी ओर घने वृक्ष, बादलों का आवागमन, हवा की मधुर ठंडक और पक्षियों की मधुर ध्वनि यहाँ के वातावरण को आध्यात्मिक बना देते हैं !
मंदिर के मुख्य गर्भगृह में अर्बुदा माता की मूर्ति प्राचीन शिल्प शैली में स्थापित है। मूर्ति के पास हवन कुंड, दीप स्तंभ, और परिक्रमा मार्ग भी निर्मित हैं !

अर्बुदा माता मंदिर का धार्मिक महत्व
यह मंदिर राजस्थान, गुजरात, हरियाणा और मध्यप्रदेश के लाखों परिवारों का कुलदेवी स्थल है ! विवाह, मुंडन, नए निर्माण शुभारंभ आदि मांगलिक कार्यों से पहले लोग यहाँ आकर माता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं !
नवरात्रि के समय मंदिर में भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है, घुमर, गरबा और लोक भक्ति गीत यहाँ का वातावरण भक्तिमय बना देते हैं।
कैसे पहुँचे अर्बुदा माता मंदिर ?
स्थान: माउंट आबू, ज़िला – सिरोही (राजस्थान)
निकटतम रेलवे स्टेशन: आबू रोड (लगभग 28 km दूरी)
निकटतम हवाई अड्डा: उदयपुर या अहमदाबाद
स्थानीय यातायात: टैक्सी, जीप व रोडवेज बस उपलब्ध
टेकरी पर चढ़ने के लिए भक्तों को सीढ़ियों का मार्ग लेना होता है, जहाँ मार्ग में लोक-भजनों और हरी-भरी प्रकृति के बीच चढ़ाई आनंददायक हो जाती है !
भक्तों में आस्था क्यों इतनी गहरी है?
कहा जाता है कि माता के दर्शनों से:
- मानसिक शांति प्राप्त होती है
- पारिवारिक कष्टों से मुक्ति मिलती है
- संतान की प्राप्ति होती है
- व्यापार और कार्यों में सफलता मिलती है
लोग यहाँ श्रद्धा से माताजी को लाडू चूरमा और सुकड़ी का भोग चढाते है और श्रीफल नारियल, चुनरी चढ़कर नारियल वाटी को हवनकुंड में होम करते है !
आबुराज माउंट आबू की शांति, प्राकृतिक दृश्य और आध्यात्मिक वातावरण के बीच अर्बुदा माता मंदिर न सिर्फ एक तीर्थ स्थल है, बल्कि यह भक्ति और प्रकृति का दिव्य संगम है ! यह स्थान भक्तों को सिर्फ दर्शन ही नहीं देता, बल्कि अंदर से आत्मिक शांति, शक्ति और विश्वास प्रदान करता है !
जो व्यक्ति एक बार माता के धाम आता है, वह जीवन भर इस अनुभव को नहीं भूलता !
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