राजस्थान के सिरोही जिले में बसा हुआ प्राचीन ऐतिहासिक गाँव भीमाणा अपने धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। यह गाँव अरावली पर्वत श्रृंखला की सुंदर और शांत घाटी में स्थित है। भीमाणा रेलवे स्टेशन से लगभग 3 किलोमीटर पूर्व दिशा में स्थित इस गाँव की प्राकृतिक सुंदरता इसे एक आकर्षक स्थल बनाती है। भीमाणा का प्रमुख धार्मिक केंद्र भीमेश्वर महादेव (Bhimeshwar Mahadev Temple) मंदिर है, जिसे भीमनाथ महादेव मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर गाँव की धार्मिक आस्था का मुख्य आधार है, और यहाँ पर हर साल सैकड़ों भक्त आते हैं। इस मंदिर के अलावा, गाँव में और भी कई धार्मिक स्थल हैं, जिनमें गोपाल जी, सांवला जी, रामदेव जी, हनुमान जी, गोगाजी, सतीमाता, मेवसी माता, शीतलामाता, जैन मंदिर आदि शामिल हैं। इन सभी मंदिरों का अपना-अपना धार्मिक महत्व है, और ये गाँववासियों की आस्था और श्रद्धा के केंद्र हैं।

भीमेश्वर (भीमनाथ) महादेव मंदिर का प्राचीन इतिहास
भीमेश्वर महादेव मंदिर (Bhimeshwar Mahadev Temple) का इतिहास सैकड़ों साल पुराना है। हस्तलिखित शिलालेखों के अनुसार, इस मंदिर की पहली प्रतिष्ठा संवत 1236 में की गई थी। भीमेश्वर महादेव मंदिर (Bhimeshwar Mahadev Temple) का नाम एक शिव भक्त माली भीमाजी से जुड़ा हुआ है, भीमाजी माली हररोज गाय चराने जाते थे । लोकश्रुति के अनुसार, भीमाजी की एक गाय प्रतिदिन एक खास पहाड़ी पर जाती थीं ! एक दिन भीमाजी ने देखा कि उनकी एक गाय शिवलिंग पर जाकर अपने थनों से स्वतः दूध अर्पित कर रही थी। यह चमत्कारी घटना देखकर भीमाजी भगवान शिव के प्रति उनकी आस्था और गहरी हो गई और शिव भक्ति में लीन हो गए !
भीमाजी ने लगातार शिव की उपासना की, और एक दिन भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए। भगवान शिव के आशीर्वाद से प्रेरित होकर, इस स्थान को भीमेश्वर महादेव (Bhimeshwar Mahadev) के नाम से जाना जाने लगा। इस मंदिर की प्रतिष्ठा के बाद, आस-पास के गाँव वालों के लिए यह स्थल धार्मिक आस्था का केंद्र बन गया । इसके बाद, इस क्षेत्र का नाम भीमाणा पड़ा, जो आज भी इस ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल का प्रतिनिधित्व करता है।

मुगल आक्रमण और मंदिर का विनाश
भीमेश्वर महादेव मंदिर (Bhimeshwar Mahadev Temple) का इतिहास केवल धार्मिक दृष्टिकोण से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह मंदिर विदेशी आक्रमणों के कारण कई बार नष्ट भी हुआ। यह क्षेत्र गुजरात जाने वाले मुगल सैनिकों का एक प्रमुख मार्ग था, और मुगल सैनिकों ने यहाँ कई बार आक्रमण किया। इन आक्रमणों में मंदिरों को लूटा गया और कई बार उन्हें नष्ट कर दिया गया।
मुगल आक्रमणों के दौरान, चंद्रावती नगरी को भी पूरी तरह नष्ट कर दिया गया था। इन आक्रमणों के कारण यहाँ की जनता को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा। मुगलों ने इस क्षेत्र में मंदिरों को खंडहर बना दिया, लेकिन यहाँ की जनता की धार्मिक आस्था कभी नहीं टूटी।
मेवाड़ के महाराणा और मंदिर की सुरक्षा
मुगल आक्रमणों से क्षेत्र को बचाने और मंदिरों की सुरक्षा के लिए मेवाड़ के महाराणाओं ने समय-समय पर कई अभियान चलाए। महाराणा शिलादित्य ने 5वीं शताब्दी में बसंतगढ़ के मंदिर और किले का निर्माण करवाकर सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया। इसके बाद, महाराणा कुम्भा ने भी इस क्षेत्र को मुगलों से मुक्त कराने के लिए कई सैन्य अभियानों का नेतृत्व किया।
महाराणा कुम्भा ने विशाल सेना लेकर मुगलों पर आक्रमण किया और उन्हें मार भगाया। उन्होंने आबू पर्वत पर कब्जा कर मुगलों द्वारा लगाए गए कर को समाप्त किया। महाराणा कुम्भा के नेतृत्व में इस क्षेत्र में शांति व्यवस्था बहाल हुई और मंदिरों की मरम्मत और पुनः निर्माण किया गया। इस प्रकार, भीमेश्वर महादेव मंदिर और अन्य धार्मिक स्थलों को सुरक्षा प्रदान की गई।
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महाराणा कुम्भा का योगदान
महाराणा कुम्भा का शासनकाल मेवाड़ के इतिहास में एक स्वर्ण युग के रूप में जाना जाता है। उन्होंने इस क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण कार्य किए, जिनमें विजय स्तम्भ का निर्माण, बसंतगढ़ किले और मंदिरों का पुनर्निर्माण, और आबू क्षेत्र में मुगलों को हराना शामिल है। महाराणा कुम्भा ने चित्तौड़ में विजय स्तम्भ का निर्माण करवाया, जो उनकी महानता और उनकी विजय का प्रतीक है।
महाराणा कुम्भा ने भीमेश्वर महादेव मंदिर (Bhimeshwar Mahadev Temple) के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने मंदिर की देखरेख के लिए विशेष व्यवस्था की और स्थानीय जनता को धार्मिक गतिविधियों में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित किया। महाराणा कुम्भा की महानता और उनके धार्मिक कार्यों के कारण उन्हें “हिन्दुवा सूरज” के नाम से भी जाना जाता है।
भीमाणा गाँव का धार्मिक और सामाजिक महत्व
भीमाणा गाँव केवल मंदिरों के कारण ही प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि इसका सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व भी काफी बड़ा है। यहाँ के लोग धार्मिक आस्थाओं के साथ-साथ सामाजिक सद्भाव और पर्यावरण संरक्षण में भी विश्वास रखते हैं। प्राचीन समय से ही यहाँ के लोग नीम की लकड़ी का उपयोग इमारती काम या जलाने के लिए नहीं करते हैं। यह परंपरा इस बात को दर्शाती है कि गाँव के लोग पर्यावरण के प्रति कितने जागरूक हैं।
गाँव की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि और पशुपालन पर आधारित है। इसके अलावा, यहाँ के लोग सरकारी सेवा और व्यापार में भी सफलतापूर्वक कार्य कर रहे हैं। भीमाणा के लोग देश के विभिन्न हिस्सों में जाकर अपनी सेवाएं दे रहे हैं, जिनमें अहमदाबाद, मुंबई, दिल्ली, जोधपुर, और अन्य प्रमुख शहर शामिल हैं।
शिवरात्रि पर विशेष मेले का आयोजन
भीमेश्वर महादेव मंदिर (Bhimeshwar Mahadev Temple) में हर साल शिवरात्रि का पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इस अवसर पर एक विशाल मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें हजारों की संख्या में भक्त शामिल होते हैं। इस मेले में न केवल स्थानीय निवासी, बल्कि देश के अन्य हिस्सों में बसे गाँववासी भी भाग लेते हैं। यह मेला गाँव के लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सामाजिक आयोजन है, जहाँ वे अपने आराध्य देव भीमेश्वर महादेव की पूजा करते हैं और अपने परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
मंदिर का प्रशासन और देखरेख
भीमेश्वर महादेव मंदिर (Bhimeshwar Mahadev Temple) और अन्य धार्मिक स्थलों की देखरेख भीमनाथ महादेव कमेटी और गाँववासियों द्वारा की जाती है। मंदिर का संचालन सिरोही मंदिर देवस्थान बोर्ड के अंतर्गत होता है, जो इसकी व्यवस्थाओं का प्रबंधन करता है। देवस्थान विभाग के अधीन यह मंदिर क्रम संख्या 15 और 16 पर पंजीकृत है। मंदिर के साथ-साथ गाँव के अन्य धार्मिक स्थलों की देखरेख भी इसी कमेटी द्वारा की जाती है।
भीमाणा गाँव का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व अद्वितीय है। यह गाँव न केवल अपने मंदिरों और धार्मिक स्थलों के कारण प्रसिद्ध है, बल्कि यहाँ के लोग अपनी आस्था, परंपराओं, और सांस्कृतिक धरोहरों को संजोकर रखते हैं। भीमेश्वर महादेव मंदिर, जिसकी स्थापना शिव भक्त भीमाजी द्वारा की गई थी, आज भी शिव भक्तों के लिए एक प्रमुख धार्मिक स्थल है।





